विधायक के वायरल पत्र बाद नये बहस की शुरुआत
गाजीपुर । जनपद में जिला चिकित्सालय के प्रधानाचार्य व एक समाजसेवी के विवाद के बीच एक तीसरा एंगल भी सामने आ गया है, इस एंगल में सदर विधायक की वायरल पत्र को लेकर जदयू के प्रवक्ता विनित तिवारी ने प्रदेश के स्वास्थ् मंत्री को मेल कर यह सवाल पूछ दिया है कि क्या कोई विधायक इस तरह की नियुक्ति के सन्दर्भ में मंत्रालय को अवगत कराया है? श्री तिवारी के मेल और विधायक के पत्र विभिन्न सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसके बाद जिले में नये सीरे से बहस शुरू हो गयी है।

मालूम हो कि समाजसेवी विरेन्द्र सिंह मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य पर यह आरोप लगाया है कि इनको प्राचार्य ने मौखिक रूप से कालेज में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है। जिसको लेकर बहुत से लोग लामबंद होकर समाजसेवी के पक्ष में विभिन्न सोशल मीडिया पर प्राचार्य के खिलाफ नारा बुलंद कर रहे हैं। इसके बाद पत्रकार और ब्राम्हण रक्षा दल के संयोजक प्रेम शंकर मिश्र ने प्राचार्य का पक्ष जानने के लिए बात किया और उस बातचीत का आडियो सोशल मीडिया में प्राचार्य का पक्ष भी सामने ला दिया।बातचीत में प्राचार्य ने दावा किया कि किसी समाजसेवी को कभी भी रोक नहीं लगाया गया है, कोई लिखित, मौखिक, आडियो, विडियो हो तो कोई दिखा दे।। इस आडियो के आने के बाद समाजसेवी के आन्दोलन की धार कुछ कुंद हुई या नहीं तब तक जदयू के प्रदेश प्रवक्ता विनित तिवारी ने विधायक का पत्र के साथ कुछ वैधानिक सवाल पूछते हुए स्वास्थ्य मंत्री ब्रिजेश पाठक को मेल कर दिया।
सदर विधायक जय किशन साहु सवालों के घेरे में आ गए हैं। विवाद उस समय खड़ा हुआ जब 27 अगस्त को समाजसेवी वीरेंद्र सिंह ने सदर अस्पताल में प्रवेश रोकने का आरोप लगाया। वीरेंद्र सिंह ने इस पूरे मामले को समाजसेवा से जोड़कर प्रचारित किया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि उन्होंने यह तथ्य छुपा लिया कि वे स्वयं विधायक साहू के अधिकृत प्रतिनिधि भी हैं।
विधायक साहू ने घटना के तुरंत बाद अस्पताल पहुँचकर संवेदना जताई और फेसबुक पर लिखा कि वे “समाजसेवी के साथ हुए दुर्व्यवहार से आहत हैं।” मगर उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वीरेंद्र सिंह उनके प्रतिनिधि भी हैं। सवाल उठता है कि विधायक ने अपने ही प्रतिनिधि की पहचान क्यों छुपाई? क्या यह भाजपा और आरएसएस से मिले सम्मान का असर है, या समाजवादी पार्टी के भीतर नाराज़गी से बचने की रणनीति?
इधर, मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. आनंद मिश्रा ने अस्पताल में प्रवेश रोकने के आरोप को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि “किसी समाजसेवी के आने-जाने पर कोई रोक नहीं है।” बल्कि उन्होंने यहां तक कहा कि फील्ड में या अन्यत्र कोई भी अस्पताल के परिक्षेत्र में अनावश्यक घूम रहा है तो उसे पूछा जाता है कि आप किसी काम से हैं या केवल टहलकर्मी के लिए यहां आए हुए हैं अगर जांचोंपरान्त पाया जाता है तो उसे बड़ी अदब के साथ आग्रह करते हुए उसे कैंपस में से बाहर निकलने का आग्रह किया जाता है लेकिन किसी पीड़ित किसी समाजसेवी किसी रोगी के परिवार के साथ रहे अभिभावक को कहीं से भी निकाला नहीं जाता है।
फिलहाल यह मामला गाजीपुर की सियासत में गर्मी बढ़ा रहा है।
