गीत,संगीत और नृत्य हैं कृष्ण : आचार्य संजय तिवारी

जो गेय है वह ईश्वर भी है, इसीलिए श्रीकृष्ण स्वयं को साम वेद बताते हैं।
गीत में संगीत के स्वर ईश्वरीय अनुभूति और उपस्थिति है। जो गेय है वह ईश्वर है। गीत के स्वरों को अश्लीलता में मत परोसिए, पाप है, संस्कृति नाशक है यह प्रवृत्ति। संगीत साक्षात ईश्वर की उपस्थिति है। मनन कीजिए। इस साधना पथ को विकृत मत कीजिए।
परमपुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा है – वेदों में मैं सामवेद हूं। सामवेद को इतनी महिमा किस कारण से दी है श्रीभगवान ने, यह विचार का विषय है।

वेदानां सामवेदोऽस्मि
देवानामस्मि वासव: ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि
भूतानामस्मि चेतना ।।

श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय के 22वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं: ‘मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और भूतप्राणियों की चेतना अर्थात् जीवनी शक्ति हूँ ।’
भगवान श्रीकृष्ण ने चारों वेदों में से सामवेद को ही अपनी विभूति क्यों बताया ? ऋग्वेद यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद— इन चारों वेदों में सामवेद में परमात्मा की अत्यन्त मधुर तथा संगीतमय सुन्दर स्तुतियां दी गयी हैं । इसलिए वेदों में उसकी प्रधानता है ।
साम का अर्थ है ‘गान’ या ‘संगीत’ । सामवेद की ऋचाओं का गायन होता है । सामवेद से ही संगीतशास्त्र का प्रादुर्भाव माना जाता है । ब्रह्मा ने सामवेद से ही गीतों का संग्रह किया । संगीत रत्नाकर के रचियता शांर्गदेव ने संगीत का उपजीव्य (जिसके सहारे जीवन चलता हो) ग्रन्थ सामदेव को माना है । भरत मुनि ने भी कहा है ‘सामवेद से ही गीत की उत्पत्ति हुई है ।’ भगवान के मन अवतार नारदजी अपनी वीणा पर सामवेद की ऋचाओं का गायन करते रहते हैं ।
पूर्णावतार चौंसठ कलाओं से युक्त श्रीकृष्ण तो गायन, वादन और नृत्य के आदि गुरु हैं । वे रसेश्वर हैं । श्रीकृष्ण की वंशी (मुरली) साधारण बांसुरी की तरह कोई जड़ बांस का बना बाजामात्र नहीं है। वंशी ध्वनि अर्थात् श्रीकृष्ण के आवाहन यन्त्र की ध्वनि जो जड होकर भी चेतन का चित्तहरण करने की सामर्थ्य रखती है।
पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक श्रीमद्वल्लभाचार्यजी ने अपने ‘मधुराष्टक’ में श्रीकृष्ण के गायन, वादन और नृत्य को पृथ्वी पर सबसे अधिक मधुर बतलाया है:

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥

आपकी बांसुरी मधुर है, आपके लगाये हुए पुष्प मधुर हैं, आपके हाथ (करकमल) मधुर हैं, आपके चरण मधुर हैं, आपका नृत्य मधुर है, आपकी मित्रता मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।

गीतं मधुरं पीतं मधुरं
भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम् ।
रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥

आपके गीत मधुर हैं, आपका पीना मधुर है, आपका भोजन मधुर है, आपका शयन मधुर है, आपका रूप मधुर है, आपका टीका (तिलक) मधुर है, मधुरता के ईश हे श्रीकृष्ण! आपका सब कुछ मधुर है ।

भगवान श्रीकृष्ण का अवतार भी प्रेम, माधुर्य और आनन्द का अवतार है । प्रेम के अवतार व्रज के ठाकुर श्रीकृष्ण के चरण-स्पर्शमात्र से पृथिवीमाता का हृदय आनन्द से खिल उठा था । ऐसे रसेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में सामवेद को अपनी विभूति बतलाया, यही सामवेद की महिमा को सिद्ध करता है ।

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