स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के आध्यात्मिक राष्ट्रपिता हैं: जनमेजय उपाध्याय

विश्ववंद्य स्वामी विवेकानंद हमारे स्फूर्तिदाता,प्राणदाता, हमारे मान रक्षक ,मार्गदर्शक एवं आने वाले सभी युगों के लिए हमारे गौरव एवं गरिमा के अमर देवता बन गए है।इन महानतम महापुरुष ने जहां संसारभर में भारतमाता के मुख को उजागर किया वहीं अपने सत्य के महान संदेश से समस्त भूमण्डल को हिलाकर दिखा दिया।
भारत की राष्ट्रीय एकता के तो वे मूर्तिमान अवतार ही थे।श्री रामधारी सिंह दिनकर ने स्वामी जी के बारे कहा था कि “अभिनव भारत को जो कुछ कहना था,वह विवेकानंद के मुख से उदगीर्ण हुआ।अभिनव भारत को जिस दिशा की ओर जाना था,उसका स्पष्ट संकेत विवेकानंद ने दिया।विवेकानंद वह समुंद्र है जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता तथा उपनिषद और विज्ञान सबके सब समाहित होते है।”जिस स्वप्न के कवि विवेकानंद जी थे,गांधी और नेहरू उसके इंजीनियर हुए।
नेताजी सुभाष के शब्दों में –स्वामी विवेकानंद का धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजना देने वाला धर्म था।नयी पीढ़ी के लोगों में उन्होंने भारत के प्रति भक्ति जगाई।उनमें अतीत के प्रति गौरव और भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न की।उनके उद्गारों से लोगों में आत्मनिर्भरता एवं स्वाभिमान के भाव जगे है।
मानसिक गुलामी की निंदा-पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण की आलोचना करते हुए वह कहते है कि क्या हम दूसरों की हा में हां मिलाकर ,दूसरों की नकलकर, दूसरों की मुंह ताककर ,बड़े से बड़े अधिकार प्राप्त कर सकेंगे?क्या इसी लज्जा और कायरता से तुम वीरभोग्या स्वाधीनता प्राप्त करोगे?तुम मत भूलना कि तुम्हारे स्त्रियों का आदर्श सीता, सावित्री और दमयंती है।अपने मन में यह भाव जागृत करो कि प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है।भारत की मिट्टी ही मेरा स्वर्ग है।भारत के कल्याण में ही मेरा कल्याण है।
राष्ट्रीय एकता के आधार बिंदु थे।उनके अनुसार राष्ट्रीय एकता के लिए धर्म और आध्यात्मिकता का आधार आवश्यक है।क्योंकि कोई भी देश बिना धर्म का ज्यादा आगे नही जा सकता है।भारत एक सजीव राष्ट्र है।यहाँ की परंपरा और संस्कृति के संवाहक धर्म है।आध्यात्मिकता उसका प्राण है।हजारों वर्षों से होते आये अत्याचार और आघात को को झेलकर अगर आज हम टिके है तो उसका एकमेव कारण सिर्फ धर्म है।हम सदैव ही स्वधर्म के प्रति सजग रहे और उसकी रक्षा के लिए सदैव ही  अपने सर्वस्व की बलि चढ़ाते रहे ।हमारे पुरखों ने समस्त विपत्तियों को झेला ,सहर्ष मृत्यु को वरण किया।भावी भारत के निर्माण के लिए समय की चट्टानों के बीच से हमें जो प्रथम पग चलना होगा वह है एकीकरण का।हममें से प्रत्येक को यह संदेश सुनाया जाय कि हम हिन्दू है।हम आपसी कलह और क्षुद्र मतभेदों को भुलाकर एकीकृत हो जाये।आध्यात्मिक शक्तियों का संकलन ही भारत की सच्ची राष्ट्रीय एकता होगी।नव्य ,भव्य भारत का निर्माण आध्यात्मिक स्वरों से झंकृत होने वाले हृदयों के एकता पर ही होगा।
स्वामी जी के स्वदेश भक्ति की कसौटी-स्वामी जी के स्वदेश भक्ति की कसौटी बड़ी ही अनूठी रही है।वे कहते है कि मैं स्वदेश भक्ति में विश्वास करता हूं।परन्तु स्वदेश भक्ति में मेरा एक आदर्श है ।बड़े काम करने के लिए तीन चीजो की आवश्यकता होती है ।बुद्धि और बिचार शक्ति हमलोगो को थोड़ी दूर सहायता कर सकती है परन्तु एक दूरी के बाद वह ठहर सी जाती है।परंतु हृदय के द्वारा महाशक्ति की प्रेरणा होती है।प्रेम असंभव  को संभव कर देता है।सभी रहस्यों का द्वार प्रेम ही है।इसलिए वे भावी पीढ़ियों को हृदयवान बनने को कहते है।आज स्वामी विवेकानंद की आध्यात्मिक चेतना और धर्म की भारत को अत्यधिक आवश्यकता है।अधुना पीढ़ी नशा की ओर आशक्त होकर असमय काल के गाल में जा रही है।मानव जीवन को विज्ञान आज सरल और सुलभ बना रहा है परन्तु जीवन से सामाजिक,नैतिक,चारित्रिक और आध्यात्मिक मूल्य के अवबोध का क्षरण हो रहा है।आज भारत विश्व का सबसे बड़ा युवा देश है।युवाओं की आबादी विश्व में सबसे अधिक है।एक नव्य भारत,विकसित भारत और भव्य भारत के निर्माण के लिए पूरे युवा पीढ़ी को स्वामी विवेकानंद की धर्म,दर्शन,आध्यात्मिकता और राष्ट्रीय एकता की नितांत आवश्यकता है।संघे शक्ति कलयुगे।आज हिन्दू एकता समय की जरूरत के हिसाब से आपसी जातीय कटुता को भूलाकर एकीकरण की मांग  है।
लेखक:-जनमेजय उपाध्याय

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