रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर शपथ ग्रहण: राजनीति, संस्कृति और प्रतीकवाद का संगम : शाश्वत तिवारी
पश्चिम बंगाल की राजनीति ने एक बार फिर इतिहास, संस्कृति और सत्ता के संगम का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया है। 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद 9 मई को नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होने जा रहा है, और यह तारीख यूं ही नहीं चुनी गई। यह दिन महान कवि, दार्शनिक, शिक्षाविद और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती (25 वैशाख) का प्रतीक है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह केवल संयोग है, या फिर राजनीति द्वारा सांस्कृतिक प्रतीकों का सुनियोजित उपयोग?
रवींद्रनाथ टैगोर केवल एक कवि नहीं थे, वे बंगाल की आत्मा और भारतीय सभ्यता की चेतना के प्रतीक हैं। उनकी रचनाओं में जहां एक ओर मानवीय संवेदनाओं की गहराई है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रवाद, स्वतंत्रता और वैश्विक मानवता का समन्वय भी दिखाई देता है।
उनकी अमर कृति गीतांजलि ने उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार दिलाया, जो किसी भी एशियाई लेखक के लिए पहली उपलब्धि थी। उनका लिखा जन गण मन आज भारत का राष्ट्रगान है, जबकि आमार सोनार बांग्ला बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना।
टैगोर की विचारधारा संकीर्ण राष्ट्रवाद के विरुद्ध थी। वे मानवता को किसी भी सीमित पहचान से ऊपर रखते थे। ऐसे में उनकी जयंती पर किसी राजनीतिक दल का शपथ लेना, एक व्यापक सांस्कृतिक संदेश भी देता है, कम से कम प्रतीकात्मक रूप में।
9 मई 2026 को शपथ ग्रहण की घोषणा ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस को जन्म दिया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का यह कदम कई स्तरों पर देखा जा रहा है।
पहला, यह बंगाल की सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का प्रयास है। लंबे समय से बंगाल में यह धारणा रही है कि भाजपा एक “बाहरी” राजनीतिक शक्ति है। ऐसे में टैगोर जैसे सर्वमान्य सांस्कृतिक प्रतीक के माध्यम से अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश साफ दिखाई देती है।
दूसरा, यह एक प्रतीकात्मक संदेश भी है कि नई सरकार खुद को केवल सत्ता परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक पुनर्जागरण” के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है।
तीसरा, यह विपक्ष, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस के उस नैरेटिव को चुनौती देने का प्रयास है, जिसमें भाजपा को बंगाली अस्मिता के खिलाफ बताया जाता रहा है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग कोई नई बात नहीं है। ममता बनर्जी ने भी अपने कार्यकाल में बार-बार बंगाली संस्कृति, भाषा और साहित्य को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।
“खेला होबे” जैसे नारों से लेकर दुर्गा पूजा के भव्य आयोजनों तक, हर स्तर पर संस्कृति को राजनीति के साथ जोड़ा गया। ऐसे में भाजपा का यह कदम उसी परंपरा का एक नया अध्याय कहा जा सकता है।
लेकिन फर्क यह है कि जहां तृणमूल कांग्रेस का सांस्कृतिक विमर्श स्थानीय और क्षेत्रीय पहचान पर आधारित रहा है, वहीं भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान गढ़ने की कोशिश करती दिखती है।
यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है। क्या टैगोर जैसे महान व्यक्तित्व को राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना उचित है? टैगोर स्वयं राजनीति से दूरी बनाए रखते थे। उन्होंने 1919 के जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई “नाइटहुड” की उपाधि लौटा दी थी, जो उनके नैतिक साहस का प्रमाण है।
उनका राष्ट्रवाद समावेशी था, विभाजनकारी नहीं। वे किसी भी प्रकार की कट्टरता के खिलाफ थे। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि उनके नाम का उपयोग केवल प्रतीकात्मक न रह जाए, बल्कि उनकी विचारधारा को भी आत्मसात किया जाए।
शपथ ग्रहण की तारीख का यह चयन केवल राजनीतिक वर्ग के लिए ही नहीं, बल्कि आम जनता के लिए भी एक संदेश है। यह बताता है कि राजनीति अब केवल नीतियों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह भावनाओं और प्रतीकों के स्तर पर भी संवाद स्थापित कर रही है।
बंगाल के मतदाता, जो अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर बेहद संवेदनशील हैं, इस कदम को कैसे देखते हैं, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
भाजपा के लिए असली चुनौती केवल इस प्रतीकात्मक कदम तक सीमित नहीं है। उसे यह साबित करना होगा कि वह वास्तव में बंगाल की संस्कृति, भाषा और परंपराओं का सम्मान करती है।
टैगोर के नाम पर शपथ लेना आसान है, लेकिन उनकी विचारधारा को शासन में उतारना कहीं अधिक कठिन।
क्या नई सरकार शिक्षा, साहित्य और कला के क्षेत्र में वैसा ही वातावरण बना पाएगी, जैसा टैगोर चाहते थे?
क्या वह समाज में समावेशिता और सहिष्णुता को बढ़ावा देगी?
ये सवाल आने वाले वर्षों में भाजपा के शासन का मूल्यांकन तय करेंगे।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और राजनीतिक विमर्श
तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस कदम को “राजनीतिक अवसरवाद” करार दिया है। उनका कहना है कि भाजपा केवल चुनावी लाभ के लिए टैगोर के नाम का उपयोग कर रही है।
हालांकि, यह भी सच है कि राजनीति में प्रतीकों का उपयोग हमेशा से होता आया है, चाहे वह महात्मा गांधी हों, बाबा साहेब आंबेडकर हों या फिर टैगोर।
अंतर केवल इतना है कि कौन-सा दल इन प्रतीकों को कितनी ईमानदारी से अपनाता है।
रवींद्रनाथ टैगोर की 165वीं जयंती पर बंगाल, शपथ ग्रहण समारोह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है। यह एक ऐसा क्षण है, जहां संस्कृति, इतिहास और सत्ता एक साथ खड़े हैं।
यह भाजपा के लिए एक अवसर है, और एक परीक्षा भी।
अवसर इसलिए, क्योंकि वह बंगाल की सांस्कृतिक धारा से खुद को जोड़ सकती है।
परीक्षा इसलिए, क्योंकि उसे यह साबित करना होगा कि यह जुड़ाव केवल दिखावा नहीं, बल्कि वास्तविक है।
अंततः, टैगोर की ही पंक्तियों में कहें तो-
“जहां मन भय से मुक्त हो…”
क्या नई सरकार उस आदर्श को साकार कर पाएगी? या फिर यह भी केवल एक राजनीतिक प्रतीक बनकर रह जाएगा? समय इसका उत्तर देगा।
(लेखक जाने-माने स्वतंत्र पत्रकार हैं)
